
युवा शिविर
युवा शिविर
तिथि और स्थान जल्द अपडेट होंगे।
७ दिवसीय आवासीय शिविर
शरीर ही हमारा मंदिर है, इसे समझें और स्वस्थ रखें। सात दिन तक एक दिनचर्या जीकर देखिए — और अपने डॉक्टर स्वयं बनिए।
अगला शिविर
१–८ नवंबर २०२६
सामुदायिक भवन, मालवीय नगर, जयपुर
अभी पंजीकरण करेंशिविर शुल्क और भुगतान की शर्तें भुगतान से पहले स्पष्ट की जाती हैं

शरीर की भागवत सात दिन का आवासीय शिविर है, रविवार से रविवार। इसमें प्रवचन सुनने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सात दिन तक भोजन, विश्राम, प्राणायाम और मौन की एक निश्चित दिनचर्या जी कर देखी जाए।
शिविर का उद्देश्य अपने शरीर, विचार और भावों को अधिक सजगता से देखना और ऐसी सरल दिनचर्या बनाना है जिसे घर लौटकर भी निभाया जा सके।
शिविर पूरी तरह आवासीय है। बीच में आना-जाना क्रम तोड़ देता है, इसलिए पूरे सात दिन रुकना आवश्यक है।
आपकी दिनचर्या के अनुसार लिखा गया, घर लौटकर निभाने के लिए।
पहले दिन के संकल्प को छठे दिन फिर देखकर अपने अनुभव को समझना।
भोजन बनाना सीखिए। जो घर पर न बन सके, वह दिनचर्या का हिस्सा नहीं बन सकता।
छठे दिन, घर लौटने से पहले अपने व्यावहारिक प्रश्न स्पष्ट करने के लिए।
आवास साझा कक्षों में होता है, पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग। बिस्तर और स्वच्छता की व्यवस्था शिविर की ओर से रहती है।
भोजन पूर्णतः सात्विक रहता है, दिन में तीन बार निश्चित समय पर। तीसरे दिन उपवास होता है, जिसमें जल, नींबू-शहद जल और आवश्यकता होने पर रस लिया जाता है।
ऊर्जा, स्पष्टता, उल्लास और भीतर की स्थिरता के लिए चार जुड़ी हुई दिशाएँ।
शिविर का एक दिन
शिविर में आने से पहले सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है: वहाँ होगा क्या? पूरा दिनक्रम यहाँ है।
शरीर की वर्तमान स्थिति समझना
अनुभव
ये व्यक्तिगत अनुभव हैं। परिणाम हर व्यक्ति में भिन्न होते हैं।
सात दिन में सबसे बड़ा अंतर यह आया कि सुबह उठते ही भारीपन नहीं रहता। खाने का समय बदला, और नींद अपने आप सुधर गई।
सरल दिनचर्या ने मुझे दिखाया कि मेरे पास समय की कमी नहीं थी, प्राथमिकताओं की स्पष्टता कम थी। घर लौटकर काम और परिवार दोनों के लिए अधिक जगह बनी।
मौन के छोटे अंतराल मेरे लिए सबसे उपयोगी रहे। अब किसी कठिन बात का उत्तर देने से पहले कुछ क्षण रुकना स्वाभाविक होने लगा है।
भजन, सेवा और साथ बैठकर भोजन करने में जो सहज आनंद मिला, वही मेरे लिए शिविर की सबसे सुंदर स्मृति है।
सुबह की सहज गति, समय पर भोजन और जल्दी विश्राम का क्रम घर पर भी निभ सका। सबसे बड़ा लाभ यह था कि दिन बिखरा हुआ नहीं लगा।
आश्रम में गंगा किनारे के सात दिन — मौन, प्राणायाम और सादा भोजन। मन का बोझ भी उतरा।
सहयोग
स्वैच्छिक योगदान सेवा, अध्ययन सामग्री और सामुदायिक कार्य में उपयोग होता है। यह लागू शिविर शुल्क से अलग है।
सुझाई गई राशि
वही राशि चुनें जो आपके लिए सहज हो। सहयोग पूर्णतः स्वैच्छिक है।
जानें सहयोग कहाँ लगता हैआपका सहयोग किसमें लगता है
पुष्ट शिविर की जानकारी स्पष्ट रूप से दिखाई गई है। अपुष्ट कार्यक्रमों को जल्द अपडेट के रूप में चिह्नित किया गया है।
छाँटें
३ शिविर

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संस्थापक

पूज्य परम आनन्द जी चार दशकों से भोजन, दिनचर्या और सजगता के माध्यम से शरीर के साथ सहयोग करने की बात कह रहे हैं। उनका मार्गदर्शन छोटे, नियमित और व्यावहारिक बदलावों पर केंद्रित है।
उनका शिविर केवल उपदेश नहीं देता। वह सात दिन तक एक दिनचर्या जीकर दिखाता है, ताकि लौटने के बाद व्यक्ति स्वयं उसे निभा सके।
शंका समाधान