संस्थापक
परम आनन्द जी
चार दशकों से एक ही बात — शरीर स्वयं ठीक होना जानता है, उसे केवल अवसर चाहिए।
जो वे कहते हैं
“अपने डॉक्टर स्वयं बनें” — यह वाक्य उनके हर प्रवचन में लौटता है, और प्रायः ग़लत समझा जाता है। इसका अर्थ चिकित्सक को छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है अपने शरीर के संकेतों को पहचानना सीखना, क्योंकि वह जानकारी किसी और के पास हो ही नहीं सकती।
“आहार ही औषधि है” — दिन में तीन बार लिया जाने वाला निर्णय किसी भी दवा से अधिक देर तक शरीर पर काम करता है। उनका पूरा कार्य इसी एक बात को व्यवहार में उतारने का है।
“शरीर ही हमारा मंदिर है” — जब तक यह दृष्टि नहीं बनती, नियमों की कोई सूची टिकती नहीं।
शिविर का ढंग
वे शिविर में उपदेश देने की जगह दिनचर्या चलाते हैं। सात दिन तक हर व्यक्ति वही समय, वही आहार और वही क्रम निभाता है, और छठे दिन अपनी ही जाँच रिपोर्ट में अंतर देखता है।
वे किसी की दवा बंद नहीं करवाते। छठे दिन चिकित्सक परामर्श रखा जाता है, और आगे का निर्णय शिविरार्थी अपने ही चिकित्सक के साथ लेता है। यह उनकी सबसे दोहराई गई सावधानी है।

“अपने डॉक्टर स्वयं बनें — आइए जानिए, कैसे?”

साधना की झलक
जीवन के क्षण
परम आनन्द जी के साथ तिलक संस्कार का एक आत्मीय क्षण
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