
विधि
आहार ही औषधि है
जो थाली में है वही सबसे पहले शरीर से बात करता है — दवा उसके बाद आती है।
भोजन एक निर्णय है
दिन में तीन बार हम एक निर्णय लेते हैं जिसका असर शरीर पर किसी भी दवा से अधिक और अधिक देर तक रहता है। पर हम उसे निर्णय मानते ही नहीं — वह आदत बन कर चलता रहता है।
शिविर का पहला काम इसी आदत को फिर से निर्णय बना देना है। सात दिन तक भोजन का समय, मात्रा और प्रकृति — तीनों तय रहते हैं, ताकि शरीर यह दिखा सके कि उसे वास्तव में चाहिए क्या।
शरीर स्वयं ठीक होना जानता है
कटी हुई उँगली को कोई जोड़ता नहीं — वह स्वयं जुड़ती है। शरीर की यही क्षमता भीतर भी काम करती है, बशर्ते उसे अवसर मिले।
अवसर का अर्थ है विश्राम। जब पाचन तंत्र लगातार काम में लगा रहे तो मरम्मत का समय नहीं बचता। उपवास और हल्का आहार वही अंतराल बनाते हैं।
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